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अफ़्सुर्दा था ऐसा कि जूँ आब-ज़दा ख़ाक आँधी थी बला था कोई आशोब-ए-जहाँ था

My heart was not so broken that even the water-born dust Could withstand the storm, for there was a mighty, world-sweeping gale.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अफ़्सुर्दा न था ऐसा कि जूँ आब-ज़दा ख़ाक आँधी थी बला था कोई आशोब-ए-जहाँ था अर्थात, मेरा दिल इतना टूटा नहीं था कि वह जल से उपजी धूल भी झेल सके; बल्कि वहाँ कोई प्रचंड, दुनिया को झकझोर देने वाली आँधी मौजूद थी।

विस्तार

यह शेर शायर Mir Taqi Mir ने जीवन की एक बहुत गहरी बात कही है। वह कहते हैं कि मेरा ग़म इतना बड़ा नहीं था कि गीली मिट्टी भी धूल बन जाए। असली तबाही, असली आँधी... वह तो इस ज़माने का बवाल है। शायर बताते हैं कि दुनिया का ये कोलाहल, ये तफ़रीक़... ये किसी भी व्यक्तिगत ग़म से कहीं ज़्यादा बड़ा नुक़सान है।

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