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সব পাওয়া যদি না পাই, শুধু চলার মাঝেই পাই,
এই যাত্রার শেষ নেই— এইটেই আমার আনন্দ॥

সব পাওয়া যদি না পাই, শুধু চলার মাঝেই পাই, এই যাত্রার শেষ নেই— এইটেই আমার আনন্দ॥

रवींद्रनाथ टैगोर
अर्थ

यदि मुझे सब कुछ प्राप्त न भी हो, तो भी मैं उसे केवल चलने की प्रक्रिया में ही पाता हूँ। इस यात्रा का कोई अंत नहीं है, और यही मेरा आनंद है।

विस्तार

यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन में सब कुछ पा लेने में नहीं, बल्कि लगातार चलते रहने में ही सच्चा सुख है। कवि कहते हैं कि भले ही हमें अपनी हर इच्छा पूरी न हो, फिर भी आगे बढ़ने की प्रक्रिया, अनुभव करने और जीने के हर पल में ही आनंद मिलता है। उन्हें इस बात में खुशी है कि जीवन की यह यात्रा, यह खोज कभी खत्म नहीं होती। यह निरंतर विकास, सीखने और खोज करने का उत्सव है, जहाँ कोई अंतिम पड़ाव न होना ही परम संतोष और आश्चर्य का स्रोत बन जाता है। यह हमें हर कदम को संजोने के लिए प्रेरित करता है।

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