Sukhan AI
ग़ज़ल

নির্ঝরের স্বপ্নভঙ্গ

چشمے کی خواب سے بیداری

यह ग़ज़ल एक झरने के अपनी निद्रा से जागने का सुंदर चित्रण करती है, जो स्वतंत्रता और निरंतर प्रगति की गहरी इच्छा का प्रतीक है। इसमें बाधाओं को तोड़कर आगे बढ़ने, दुनिया को जीतने और बिना रुके जीवन को अपनाने की एक अटूट भावना व्यक्त की गई है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
আজি বাংলা দেশের হৃদয় হতে কখন আপনি, তুই কি আমার কাছে আসিবি, ওরে ঝরণা-ধারা॥
हे झरने की धारा, तुम कब बंगाल के हृदय से स्वतः मेरे पास आओगी?
2
আজি এসেছে ভোর, কোথায় নিদ্রা, কোথায় স্বপন, পাথর সরায়ে উঠব আমি, করব ভুবন-জয়॥
आज भोर आ गई है, अब नींद और सपने कहाँ? मैं पत्थर हटाकर उठूँगा और संसार को जीतूँगा।
3
সুদূর থেকে ডাক আসে মোর, যাই যাই যাই, এ বাঁধ ভেঙে ছুটে চলব আজ, আর থামব নাই॥
दूर से मुझे एक पुकार आती है, मैं जाता हूँ, जाता हूँ, जाता हूँ। आज मैं इस बंधन को तोड़कर आगे बढ़ता रहूँगा और अब रुकूँगा नहीं।
4
পাগলা হাওয়ার বাদল-দিনে, পাগল আমার মন, চলতে চলতে চলব আমি, নাই থামার ক্ষণ॥
पागल हवा और बारिश के दिन में, मेरा मन बावला है। मैं चलता रहूँगा, रुकने का कोई पल नहीं है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.