“আমার সকল সাধনার তুমি চরম পাওয়া। তবু কেন, হে প্রিয়, থাকো অধরা—”
मेरी सभी साधनाओं की तुम ही चरम उपलब्धि हो। फिर भी, हे प्रिय, तुम क्यों अप्राप्य रहते हो?
यह खूबसूरत दोहा गहरी भक्ति को दर्शाता है। वक्ता महसूस करता है कि उसके हर एक प्रयास और आध्यात्मिक यात्रा का अंत सिर्फ एक परम अनुभूति में होता है: वह प्रिय। मानो उसकी सारी कड़ी मेहनत और हर कोशिश इसी 'तुम' में अपनी अंतिम परिणति पाती है। फिर भी, इस गहरी समझ के बावजूद कि प्रिय ही उसका सबसे बड़ा पुरस्कार है, एक मार्मिक प्रश्न है। वे पूछते हैं कि क्यों, सब कुछ होने पर भी, यह प्रिय उनसे पहुंच से बाहर, मायावी या अप्राप्य रहता है। यह लालसा की एक छू लेने वाली अभिव्यक्ति है, जहाँ परम सत्य अंतरंग रूप से ज्ञात होकर भी दूर महसूस होता है।
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