साँस लेते हुए भी डरता हूँ ये न समझें कि आह करता हूँ

“I dread even to draw a breath, lest they mistake it for a sigh.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

मुझे साँस लेते हुए भी डर लगता है कि कहीं लोग यह न समझ लें कि मैं दर्द भरी आह भर रहा हूँ।

विस्तार

यह शेर ख़ामोशी में दर्द सहने और इश्क़ में अपने आत्मसम्मान को बचाए रखने की बहुत मार्मिक तस्वीर खींचता है। शायर का दर्द इतना नाज़ुक है कि वह एक साधारण साँस लेने से भी कतराता है, कहीं महबूब या ज़माना उसे कोई शिकवा या आह न समझ ले। यहाँ सब्र और संकोच की वह इंतहा दिखाई गई है जहाँ इंसान अपने अंदर के तूफ़ान को छुपाने के लिए अपनी साँस पर भी पहरा लगा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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