बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हबाब
मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ
“In the ocean of existence, I am like a bubble; the very moment I rise, I am undone.”
— अकबर इलाहाबादी
अर्थ
जीवन रूपी सागर में मेरी मिसाल एक बुलबुले की तरह है, जो जैसे ही सतह पर उभरता है, मिट जाता है।
विस्तार
शायर ने ज़िंदगी के इस अथाह समंदर में इंसान के वजूद की तुलना पानी के एक नाज़ुक बुलबुले से की है। बुलबुला जैसे ही सतह पर उभरकर अपनी पहचान बनाना चाहता है, ठीक उसी पल फूटकर हमेशा के लिए मिट जाता है। यह शेर बड़ी सादगी से ज़िंदगी की नश्वरता को छूता है, जहाँ खुद को साबित करने की हमारी ख्वाहिश ही अक्सर हमारे मिट जाने का सबब बन जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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