“That form, in its formlessness, becomes non-dual,A trace of duality-non-duality then vanishes.”
जब स्वरूप अरूप में अद्वैत हो जाता है, तब द्वैत-अद्वैत का लेशमात्र भी मिट जाता है।
यह अद्भुत दोहा एक गहन आध्यात्मिक अवस्था का वर्णन करता है। यह हमें सिखाता है कि जब हमारा वास्तविक स्वरूप, यानी हमारा अंतर्निहित रूप, निराकार में विलीन हो जाता है, तो वह हर चीज के साथ एकाकार हो जाता है। इस परम एकता में, साकार और निराकार के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता है। 'द्वैत' (जहाँ चीजें अलग हैं) या 'अद्वैत' (जहाँ वे एक हैं) के विचार भी पूरी तरह से मिट जाते हैं। यह सभी अवधारणाओं और भेदों से परे की अवस्था है, जहाँ केवल शुद्ध, निर्दोष एकता शेष रहती है, जो सभी विचारों और धारणाओं से परे है। यह पूर्ण एकता की अवस्था तक की यात्रा है।
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