જો જાણે વાંચ્યાની પેર
અખા કાં ન વાંચે ઘેર.
“If you know the proper way to read,Akha, why do you not read at home?”
— अखा भगत
अर्थ
यदि तुम पढ़ने का सही तरीका जानते हो, अखा, तो घर पर क्यों नहीं पढ़ते हो?
विस्तार
कवि अखा हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। वे पूछते हैं कि यदि हमें वाकई में किसी ज्ञान या धर्मग्रंथ का सार समझना आ गया है, तो हम उसे अपने 'घर' में – यानी अपने जीवन में, अपने भीतर – क्यों नहीं अपनाते? यह एक विनम्र आग्रह है कि ज्ञान को केवल पढ़ा या सुना न जाए, बल्कि उसे अपने भीतर उतारा जाए और अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए। सच्चा ज्ञान बाहर ढूँढने या दिखाने की चीज़ नहीं, बल्कि भीतर से जीने की चीज़ है।
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