“As per its capacity, the soul awakens,And in bondage, it is always taken.”
आत्मा अपनी क्षमता के अनुसार जागृत होती है, परंतु वह सदैव बंधन में ही रहती है।
यह दोहा बताता है कि हमारा अंतरात्मा या चेतना (जीव) चीजों को अपनी क्षमता या सीमाओं के भीतर ही समझती या निर्देश देती है। जैसे हमारे मन की एक निश्चित 'क्षमता' (गजा) होती है, और वह केवल उसी दायरे में आने वाली बातों को समझ सकता है या खुद को सिखा सकता है। इसी स्वाभाविक कार्यप्रणाली के कारण, यह लगातार किसी न किसी 'बंधन' या सीमा में फंसा रहता है। यह 'बंधन' हमारी आसक्तियां, अहंकार, सांसारिक चिंताएं, या हमारी व्यक्तिगत धारणाओं की सीमाएं भी हो सकती हैं, जो हमें अपनी पूरी क्षमता या सच्ची स्वतंत्रता को महसूस करने से रोकती हैं। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि हमारी समझ और कार्य अक्सर हमारी अपनी थोपी हुई या स्वाभाविक सीमाओं से बंधे होते हैं।
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