“The days of reciting ghazals are over now, O Hali; why sing an untimely melody when the hour has passed?”
हे हाली, अब ग़ज़लें कहने और सुनाने के दिन बीत चुके हैं, इसलिए अब बेवक्त का राग अलापने का क्या फ़ायदा?
हाली यहाँ संगीत का खूबसूरत रूपक बाँधते हुए कहते हैं कि जैसे बे-वक्त गाया गया राग अपना असर खो देता है, वैसे ही अब सिर्फ़ हुस्न-ओ-इश्क़ की पारंपरिक ग़ज़लें कहने का ज़माना बीत चुका है। अपने दौर के मुश्किल हालातों को देखते हुए वे महसूस करते हैं कि शायरी को अब कोरी रूमानियत छोड़कर ज़िम्मेदारी और हक़ीक़त की बात करनी चाहिए। यह शेर हमें सिखाता है कि अगर फ़न या कला वक़्त के बदलते मिज़ाज से क़दम न मिलाए, तो वह बेअसर होकर रह जाती है।
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