मान लीजे शैख़ जो दा'वा करे इक बुज़ुर्ग-ए-दीं को हम झुटलाएँ क्या

“Let us concede whatever claim the Shaikh may make; why should we dare belie an elder of the faith?”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

शैख़ जो भी दावा करें उसे मान लेना चाहिए; धर्म के ऐसे बुज़ुर्ग को भला हम कैसे झूठा ठहराएँ?

विस्तार

इस शेर में उर्दू शायरी का जाना-पहचाना तंज़ और नज़ाकत भरी व्यंग्योक्ति देखने को मिलती है। ऊपर से देखने पर शायर शैख़ साहब का पूरा लिहाज़ करते हुए कहता है कि धर्म के इतने बड़े बुज़ुर्ग की बात को भला हम कैसे झूठा कहें। लेकिन इस मासूमियत के पर्दे के पीछे एक गहरी चुटकी छिपी है—शायर दरअसल यह समझा रहा है कि शैख़ के दावों में सच्चाई भले न हो, पर उनसे उलझने के बजाय उनकी हाँ में हाँ मिला देना ही बेहतर है।

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