ग़ज़ल
Aa Mil Yaar
Aa Mil Yaar
यह ग़ज़ल प्रेम और आस्था के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है। कवि कहता है कि सच्चा प्रेम किसी धर्म या जाति का मोहताज नहीं होता, और यह समाज के झूठे आडंबरों और छल-कपट पर सवाल उठाता है। यह मानव मन की जटिलताओं और सच्चाई की खोज पर प्रकाश डालती है।
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1
Ander khawab vchora hoya, Khabar na payndi teri
Soni ban wich luti saiyaan, Soor palang ney gheyri
स्वप्न की गहराई में, मेरा प्रियजन खो गया है, मुझे तेरा पता नहीं चलता।
2
Mullan Qazi rah batawaan, Deen dharam dey pherey
Aye taan thag jugat dey jhaar, lawaanjaal chufereey
मुल्लान काज़ी, राह बतावाण, दीन-धर्म के फेरे। ऐ तान ठग जुगाट दे जार, लावाणजाल चुफरे।
3
Karam sharo dey dharam batawan, Sangal pawan pereen
Zaat mazhab yeh ishq na pochdaa, Ishq shara da weri
कर्म से धर्म बताएगा, जंगल पवन परेन। ज़ात मजहब ये इश्क़ न पूछता, इश्क़ शरा का वेरी।
4
Nadioon paar aye mulk sajan da, lehar lobh ney gheri
Satgor beri perhi khalotey, ten kion lai aweri
नदियों के पार आए प्रिय देश, तुम्हारी लहरों में गहराई नहीं है; तुम मनमोहक वस्त्र पहनकर यहाँ क्यों आती हो।
5
Bulleh Shah sho tenoon milsi. Dil noo dey dileyri
Pritam pass tey tolna kis noon? bhlioon shaker dopheri
बुल्ले शाह, आपका शरीर एक रहस्य है; आपका दिल एक निरंतर संघर्ष है। प्रियतम की निकटता को प्रेम की तराजू से तौलना, ग्रीष्म दोपहर में बादल के गुजरने जैसा है।
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