“Bulleh Shah, I cannot bear your attire, Just by seeing your face, I cannot bear to live. Constantly yearning and thinking, I have done, Now, let me sit in this separation, heart-broken, Please, just stop, please just stop.”
बुल्ले शाह, मैं तुम्हारे वस्त्र नहीं सह सकता, तुम्हारे मुख को देखकर मैं जी नहीं सकता। लगातार याद करना और सोचना, मैंने बहुत किया है; अब बस इस बिछोह में बैठे रहो। बस करो, बस करो।
यह ग़ज़ल विरह की गहरी पीड़ा और प्रेम की उत्कट पुकार है। बुलले शाह यहाँ अपने महबूब से कह रहे हैं कि बस आपके मुख को देखने मात्र से ही मेरा जीवन समाप्त हो जाएगा। उन्होंने अपने जीवन की लगातार मिन्नतें करना बताकर, अब विरह में व्याकुल होकर बस शांति की प्रार्थना की है। यह एक भावपूर्ण विनती है कि इस दर्द भरे सफर को अब विराम मिले।
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