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दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

I am not forever lying at your door;Shame on such a life, that I am not a stone.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मैं हमेशा तुम्हारे दरवाज़े पर पड़ा नहीं हूँ; ऐसी ज़िंदगी पर धिक्कार है कि मैं पत्थर नहीं हूँ।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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