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ग़ज़ल

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं

دائم پڑا ہوا ترے در پر نہیں ہوں میں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 8 shers· radif: मैं

यह ग़ज़ल मानवीय गरिमा और व्यक्तित्व पर ज़ोर देती है, किसी के दर पर हमेशा पड़े रहने या पत्थर बनने से इनकार करती है। यह जीवन के निरंतर संघर्षों पर सवाल उठाती है, इस बात पर बल देती है कि एक इंसान के रूप में दिल का विचलित होना स्वाभाविक है। कवि पूछता है कि दुनिया उसे क्यों मिटाना चाहती है, यह कहते हुए कि वह संसार की पटिया पर दोहराया गया अक्षर नहीं है, और अंततः पीड़ा की सीमा के लिए प्रार्थना करता है, यह स्वीकार करते हुए कि वह एक पापी है लेकिन काफ़िर नहीं।

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1
दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं
मैं हमेशा तुम्हारे दरवाज़े पर पड़ा नहीं हूँ; ऐसी ज़िंदगी पर धिक्कार है कि मैं पत्थर नहीं हूँ।
2
क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल इंसान हूँ पियाला ओ साग़र नहीं हूँ मैं
दिल लगातार मुश्किलों और उतार-चढ़ाव से क्यों न घबराए? मैं एक इंसान हूँ, कोई प्याला या शराब का पात्र नहीं हूँ।
3
या-रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर नहीं हूँ मैं
हे प्रभु, समय मुझे क्यों मिटाना चाहता है? मैं संसार की पटिया पर कोई दोहराया हुआ शब्द नहीं हूँ।
4
हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते आख़िर गुनाहगार हूँ काफ़र नहीं हूँ मैं
सज़ा में दी जाने वाली तकलीफ़ की भी एक हद होनी चाहिए। आख़िर मैं एक गुनाहगार ही तो हूँ, कोई काफ़र नहीं हूँ।
5
किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे लअ'ल ओ ज़मुर्रद ओ ज़र ओ गौहर नहीं हूँ मैं
तुम मुझे किस वास्ते (किसलिए) अज़ीज़ (प्यारा/कीमती) नहीं जानते? क्या मैं लाल, पन्ना, सोना और मोती नहीं हूँ?
6
रखते हो तुम क़दम मिरी आँखों से क्यूँ दरेग़ रुत्बे में महर-ओ-माह से कम-तर नहीं हूँ मैं
तुम मेरे आँखों पर अपने कदम रखने से क्यों हिचकिचाते हो? मैं रुतबे में सूर्य और चंद्रमा से कम नहीं हूँ।
7
करते हो मुझ को मनअ-ए-क़दम-बोस किस लिए क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मैं
तुम मुझे अपने कदमों को चूमने से क्यों रोकते हो? क्या मैं आसमान के भी बराबर नहीं हूँ?
8
'ग़ालिब' वज़ीफ़ा-ख़्वार हो दो शाह को दुआ वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं
ग़ालिब, अब तुम वज़ीफ़ा-ख़्वार हो (पेंशनर हो), बादशाह को दुआ दो। वे दिन चले गए जब तुम कहते थे कि मैं नौकर नहीं हूँ।
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