दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ
“No temple, no Kaaba, no door, no threshold to claim, We sit by the roadside; why would a stranger lift our frame?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
न तो कोई मंदिर है, न काबा, न कोई दरवाज़ा है और न कोई चौखट हमारी है। हम तो राह पर बैठे हैं, तो कोई अजनबी हमें क्यों उठाएगा?
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
