मर जाऊँ न क्यूँ रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक
आग़ोश-ए-ख़म-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे
“Why shouldn't I die of envy's keen pain,When that delicate form, so fair, so slight,In the curved embrace of the sacred thread does gain?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं रश्क से क्यों न मर जाऊँ जब वह नाज़ुक बदन जनेऊ के मुड़े हुए घेरे के आगोश में आए?
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
