ग़ज़ल
कब वो सुनता है कहानी मेरी
کب وہ سنتا ہے کہانی میری
यह ग़ज़ल महबूब की बेरुखी पर शायर के दर्द को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है, जहाँ उसकी कहानियाँ अनसुनी रह जाती हैं। शायर अपनी गहन आंतरिक पीड़ा को व्यक्त करता है, जो उसके आँसुओं और अनूठी, शायद अव्यवस्थित, अभिव्यक्ति में झलकती है। कवि यह भी संकेत देता है कि शायद भुला दिया जाना ही उसकी अंतिम पहचान होगी।
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1
कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी
वह मेरी कहानी कब सुनता है? और वह भी जब मैं स्वयं ज़बानी सुनाऊँ।
2
ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ
देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी
उस खून बहाने वाली नज़र की पीड़ा मत पूछो, बस मेरे खून के आँसू बहाने को देखो।
3
क्या बयाँ कर के मिरा रोएँगे यार
मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी
मेरे दोस्त मेरा क्या बयान करके रोएँगे? सिवाय मेरी उलझी हुई और असंगत बातों के।
4
हूँ ज़-ख़ुद रफ़्ता-ए-बैदा-ए-ख़याल
भूल जाना है निशानी मेरी
मैं अपनी कल्पना के विस्तृत रेगिस्तान में स्वयं को भुला चुका हूँ, और भूल जाना ही मेरी पहचान है।
5
मुतक़ाबिल है मुक़ाबिल मेरा
रुक गया देख रवानी मेरी
मेरा प्रतिद्वंद्वी मेरे सामने है, वह मेरी गति देखकर रुक गया।
6
क़द्र-ए-संग-ए-सर-ए-रह रखता हूँ
सख़्त अर्ज़ां है गिरानी मेरी
मैं अपनी क़द्र सड़क किनारे पड़े एक पत्थर जैसी रखता हूँ। मेरी 'गिरानी' या अहमियत बहुत सस्ती है।
7
गर्द-बाद-ए-रह-ए-बेताबी हूँ
सरसर-ए-शौक़ है बानी मेरी
मैं बेचैनी के रास्ते का बवंडर हूँ; तीव्र इच्छा की आँधी ही मेरी निर्माता है।
8
दहन उस का जो न मालूम हुआ
खुल गई हेच मदानी मेरी
जब उसका मुँह मालूम न हो सका, तो मेरा अल्प ज्ञान व्यर्थ सिद्ध हुआ।
9
कर दिया ज़ोफ़ ने आजिज़ 'ग़ालिब'
नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी
कमज़ोरी ने ग़ालिब को बेबस कर दिया है। मेरी जवानी तो ऐसी है जो बुढ़ापे के लिए भी शर्मिंदगी का सबब है।
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