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सँभलने दे मुझे ऐ ना-उम्मीदी क्या क़यामत है
कि दामान-ए-ख़याल-ए-यार छूटा जाए है मुझ से

Allow me to recover, O despair, what a doomsday this has become, That the skirt of my beloved's thought slips away from me.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

ए निराशा, मुझे संभलने दे। यह कैसी क़यामत है कि मेरे प्रिय के ख़्याल का दामन मेरे हाथ से छूटता जा रहा है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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