तकल्लुफ़ बरतरफ़ नज़्ज़ारगी में भी सही लेकिन
वो देखा जाए कब ये ज़ुल्म देखा जाए है मुझ से
“Let's set formality aside; even in mere beholding, it is true, butWhen will that true sight be seen? How can I endure this cruelty?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
तकल्लुफ़ को अलग रखिये; भले ही सिर्फ़ दूर से देखना ही सही माना जाए, लेकिन वह सच्चा दीदार कब होगा? मैं इस ज़ुल्म को कब तक बर्दाश्त करूँगा?
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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