ग़ज़ल
लताफ़त बे-कसाफ़त जल्वा पैदा कर नहीं सकती
لطافت بے کثافت جلوہ پیدا کر نہیں سکتی
यह ग़ज़ल विपरीत शक्तियों के बीच अंतर्निहित तनाव को दर्शाती है, जैसे कोमलता और सघनता का संबंध, और अदम्य शक्ति के विरुद्ध प्रतिरोध की व्यर्थता, जैसे नदी की लहरों के सामने तट का टिकना। यह ऐसे प्रेम के विषयों को भी छूती है जहाँ होशोहवास खो जाते हैं, और वसंत की उदास सुंदरता को, जो अक्सर आँसू और पीड़ा लेकर आती है। अंततः, यह जीवन की गहरी कठिनाइयों और इच्छाओं का सामना करते हुए विनम्रता और लाचारी की भावना व्यक्त करती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
लताफ़त बे-कसाफ़त जल्वा पैदा कर नहीं सकती
चमन ज़ंगार है आईना-ए-बाद-ए-बहारी का
बारीकी (सूक्ष्मता) स्थूलता (कसाफ़त) के बिना अपना सौंदर्य प्रकट नहीं कर सकती। बगीचा बसंत की हवा के आईने पर लगा जंगार है।
2
हरीफ़-ए-जोशिश-ए-दरिया नहीं खुद्दारी-ए-साहिल
जहाँ साक़ी हो तू बातिल है दा'वा होशियारी का
किनारे का स्वाभिमान नदी के उफान का मुकाबला नहीं कर सकता। जहाँ तुम साक़ी हो, वहाँ होशियारी का दावा व्यर्थ है।
3
बहार-ए-रंग-ए-ख़ून-ए-गुल है सामाँ अश्क-बारी का
जुनून-ए-बर्क़ नश्तर है रग-ए-अब्र-ए-बहारी का
बसंत के फूलों का रक्त जैसा रंग आँसू बहाने का कारण है, और बिजली का उन्माद बसंत के बादल की नस के लिए नश्तर है।
4
बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का
मैं अपनी मुश्किल को हल करने की लालसा में बेबस पड़ा हूँ; मेरे हृदय से विनम्रता का एक बंधन बँधा है।
5
ब-वक़्त-ए-सर-निगूनी है तसव्वुर इंतिज़ारिस्ताँ
निगह को आबलों से शग़्ल है अख़्तर-शुमारी का
जब सर झुकाया जाता है, तो कल्पना इंतज़ार का स्थान बन जाती है। आँखें, मानो आबलों से भरी हों, तारे गिनने में व्यस्त रहती हैं।
6
'असद' साग़र-कश-ए-तस्लीम हो गर्दिश से गर्दूं की
कि नंग-ए-फ़हम-ए-मस्ताँ है गिला बद-रोज़गारी का
असद, तक़दीर की गर्दिश को स्वीकार करो, क्योंकि बदकिस्मती की शिकायत करना समझदार लोगों की समझ के लिए शर्मनाक है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
