ग़ज़ल
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला
شوق ہر رنگ رقیب سر و ساماں نکلا
यह ग़ज़ल तीव्र इच्छा के अत्यधिक और अनियंत्रित स्वरूप को दर्शाती है, जो शांति का दुश्मन बन जाती है और मजनू के जुनून की तरह छिपी नहीं रह सकती। यह प्रेम के दर्द में मिलने वाले असीम, विरोधाभासी आनंद को भी उजागर करती है, एक ऐसा दर्द जिसे दिल भी पूरी तरह समाहित नहीं कर पाता। शे'र गहरे आंतरिक संघर्ष और प्रेमी के अकेलेपन को चित्रित करते हैं, जहाँ ऊपरी तौर पर सहायक संबंध भी सतही सिद्ध होते हैं।
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1
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला
क़ैस तस्वीर के पर्दे में भी उर्यां निकला
शौक़ हर रूप में व्यक्ति के समस्त साधनों और व्यवस्था का दुश्मन साबित हुआ। क़ैस तो तस्वीर के पर्दे में भी नग्न ही नज़र आया, जिससे उसका संसार से पूर्ण विरक्ति का भाव प्रकट होता है।
2
ज़ख़्म ने दाद न दी तंगी-ए-दिल की या रब
तीर भी सीना-ए-बिस्मिल से पर-अफ़्शाँ निकला
हे प्रभु, ज़ख़्म ने दिल की घुटन को भी राहत न दी। तीर भी मरते हुए के सीने से पर बिखेरता हुआ निकल आया।
3
बू-ए-गुल नाला-ए-दिल दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल
जो तिरी बज़्म से निकला सो परेशाँ निकला
फूल की ख़ुशबू, दिल की पुकार और महफ़िल के चिराग़ का धुआँ – जो कुछ भी तुम्हारी महफ़िल से निकला, वह सब बिखरा हुआ और परेशान ही निकला। यह दर्शाता है कि महबूब की प्रभावशाली उपस्थिति से निकलने वाली हर चीज़ अशांत और विचलित हो जाती है।
4
दिल-ए-हसरत-ज़दा था माइदा-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द
काम यारों का ब-क़दर-ए-लब-ओ-दंदाँ निकला
मेरा हसरत भरा दिल दर्द की लज़्ज़त के लिए एक भोज था, मगर दोस्तों का काम केवल जुबानी साबित हुआ, सिर्फ होंठ और दांतों तक ही सीमित रहा।
5
थी नौ-आमूज़-ए-फ़ना हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
सख़्त मुश्किल है कि ये काम भी आसाँ निकला
मेरी मुश्किलों को पसंद करने वाली हिम्मत विनाश की कला में नई थी। यह मानना बहुत मुश्किल है कि यह काम भी आसान निकला।
6
दिल में फिर गिर्ये ने इक शोर उठाया 'ग़ालिब'
आह जो क़तरा न निकला था सो तूफ़ाँ निकला
ग़ालिब, दिल में फिर से रोने-धोने ने एक तूफ़ान खड़ा कर दिया। अफ़सोस, जो एक क़तरा भी नहीं निकला था, वह एक भयंकर तूफ़ान बन गया।
7
कार-ख़ाने से जुनूँ के भी मैं उर्यां निकला
मेरी क़िस्मत का न एक-आध गरेबाँ निकला
मैं जुनून के कारखाने से भी नग्न निकला। मेरी किस्मत में एक भी गरेबां (कपड़ा) नहीं निकला।
8
साग़र-ए-जल्वा-ए-सरशार है हर ज़र्रा-ए-ख़ाक
शौक़-ए-दीदार बला आइना-सामाँ निकला
हर धूल का कण ईश्वरीय तेज से भरा प्याला है। दर्शन की चाहत कितनी अद्भुत रूप से स्वयं एक दर्पण बन गई।
9
कुछ खटकता था मिरे सीने में लेकिन आख़िर
जिस को दिल कहते थे सो तीर का पैकाँ निकला
मेरे सीने में कुछ चुभ रहा था, लेकिन अंततः जिसे दिल कहा जाता था, वह तीर का नुकीला सिरा निकला।
10
किस क़दर ख़ाक हुआ है दिल-ए-मजनूँ या रब
नक़्श-ए-हर-ज़र्रा सुवैदा-ए-बयाबाँ निकला
हे प्रभु, मजनूँ का हृदय कितना मिट्टी में मिल गया है। हर कण का निशान रेगिस्तान के काले केंद्र के रूप में उभरा।
11
शोर-ए-रुसवाई-ए-दिल देख कि यक-नाला-ए-शौक़
लाख पर्दे में छुपा पर वही उर्यां निकला
हृदय की बदनामी का शोर देखो कि एक वासना की पुकार, लाखों पर्दों में छिपी होने पर भी, बिल्कुल नग्न होकर सामने आ गई।
12
शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना ख़ून-ए-वफ़ा से कब तक
आख़िर ऐ अहद-शिकन तू भी पशेमाँ निकला
हिना का चंचल रंग कब तक वफ़ा के ख़ून से रंगा जाएगा? आख़िर में, ऐ वादा तोड़ने वाले, तुम भी पछतावे में पाए गए।
13
जौहर-ईजाद-ए-ख़त-ए-सब्ज़ है ख़ुद-बीनी-ए-हुस्न
जो न देखा था सो आईने में पिन्हाँ निकला
सौंदर्य का आत्म-अवलोकन ही हरी रेखा (नव-यौवन के बालों) का सार बनाता है; जो पहले नहीं देखा गया था, वह दर्पण में छिपा हुआ प्रकट हुआ।
14
मैं भी माज़ूर-ए-जुनूँ हूँ 'असद' ऐ ख़ाना-ख़राब
पेशवा लेने मुझे घर से बयाबाँ निकला
ऐ असद, मैं भी जुनून (पागलपन) से लाचार हूँ, ऐ बर्बाद हाल व्यक्ति। मुझे अगुवाई के लिए लेने (अपने साथ ले जाने) के लिए जंगल खुद मेरे घर से बाहर निकला।
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