ग़ज़ल
दिल-ए-बेदार फ़ारूक़ी दिल-ए-बेदार कर्रारी
दिल-ए-बेदार फ़ारूक़ी दिल-ए-बेदार कर्रारी
यह ग़ज़ल एक आध्यात्मिक और प्रेममय भाव का मिश्रण है, जिसमें कवि को अपने हृदय की जागृति (बेदारी) की कामना करते हुए एक गहन आत्म-खोज का संदेश देता है। यह बताता है कि सच्चा प्रेम और जागृत चेतना प्राप्त करने के लिए, बाहरी दिखावे या अनुमानों पर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर की आंतरिक शक्ति और संघर्ष पर ध्यान देना आवश्यक है।
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1
दिल-ए-बेदार फ़ारूक़ी दिल-ए-बेदार कर्रारी
मिस-ए-आदम के हक़ में कीमिया है दिल की बेदारी
दिल-ए-बेदार फ़ारूक़ी, दिल-ए-बेदार कर्रारी, मिस-ए-आदम के हक़ में कीमिया है दिल की बेदारी। (अर्थ: फ़ारूक़ी का बेदार दिल और कर्रारी का बेदार दिल, मानवता के अधिकार के लिए दिल की जागरूकता का रसायन है।)
2
दिल-ए-बेदार पैदा कर कि दिल ख़्वाबीदा है जब तक
न तेरी ज़र्ब है कारी न मेरी ज़र्ब है कारी
जागृत दिल पैदा करो, क्योंकि दिल तब तक सोता है जब तक तेरी या मेरी कोई चोट महसूस नहीं होती।
3
मशाम-ए-तेज़ से मिलता है सहरा में निशाँ उस का
ज़न ओ तख़मीं से हाथ आता नहीं आहू-ए-तातारी
तेज़ हवा के झोंके से सहरा में उस का निशान मिल जाता है, पर ज़न और तख़्मिन से तातारी की आह नहीं मिलती।
4
इस अंदेशे से ज़ब्त-ए-आह मैं करता रहूँ कब तक
कि मुग़-ज़ादे न ले जाएँ तिरी क़िस्मत की चिंगारी
इस उदास विचार से मैं कब तक अपनी आहों को बंधे रखूँ, कहीं मुग़ल वंशज मेरी किस्मत की चिंगारी न छीन लें।
5
ख़ुदावंदा ये तेरे सादा-दिल बंदे किधर जाएँ
कि दरवेशी भी अय्यारी है सुल्तानी भी अय्यारी
हे ईश्वर-भक्त, यह सादा-दिल बंदे कहाँ जाएँ? कि दरवेशी भी अय्यारी है और सुल्तानी भी अय्यारी।
6
मुझे तहज़ीब-ए-हाज़िर ने अता की है वो आज़ादी
कि ज़ाहिर में तो आज़ादी है बातिन में गिरफ़्तारी
मुझे वर्तमान के शिष्टाचार ने वह आज़ादी दी है, कि बाहर से तो आज़ादी है, पर अंदर से क़ैदखाना है।
7
तू ऐ मौला-ए-यसरिब आप मेरी चारासाज़ी कर
मिरी दानिश है अफ़रंगी मिरा ईमाँ है ज़ुन्नारी
हे मौला-ए-यसरिब, आप मेरी समस्या का समाधान कीजिए; मेरी समझ विदेशी है और मेरा ईमान एक कुंवारी जैसा है।
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