ग़ज़ल
हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़
हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़
यह ग़ज़ल बताती है कि भले ही बहुत सारे डर हों, लेकिन दिल की ज़ुबान (यानी सच्चा और ईमानदार बोलना) साथ रहना चाहिए। यह जीवन की सच्चाईयों, सच्चे मार्ग और आध्यात्मिक प्रेम के महत्व पर बात करती है।
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1
हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़
यही रहा है अज़ल से क़लंदरों का तरीक़
हज़ार ख़ौफ़ होने पर भी, यदि ज़बान दिल की सहेली हो, तो यही मार्ग है जो कलंदरों ने युगों-युगों से अपनाया है।
2
हुजूम क्यूँ है ज़ियादा शराब-ख़ाने में
फ़क़त ये बात कि पीर-ए-मुग़ाँ है मर्द-ए-ख़लीक़
शराब-ख़ाने में इतना भीड़ क्यों है, बस इसलिए कि महबूब ही सारे संसार का निर्माता है।
3
इलाज-ए-ज़ोफ़-ए-यक़ीं इन से हो नहीं सकता
ग़रीब अगरचे हैं 'राज़ी' के नुक्ता-हाए-दक़ीक़
यक़ीन के ज़ख़्म का इलाज इन चीज़ों से नहीं हो सकता; भले ही 'राज़ी' के नुक्ता-हाए-दक़ीक़ (बारीक बिंदु) हों।
4
मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया ताइब
ख़ुदा करे कि मिले शैख़ को भी ये तौफ़ीक़
साधारण साधक रो-रोकर पवित्र हो गया; ईश्वर करे कि यह कृपा शेख को भी प्राप्त हो।
5
उसी तिलिस्म-ए-कुहन में असीर है आदम
बग़ल में उस की हैं अब तक बुतान-ए-अहद-ए-अतीक़
आदम अभी भी उस पुराने जादू-टोने (तिलिस्म) में फंसा हुआ है, और उसके बगल में अभी भी प्राचीन वचनों (अहद-ए-अतीक़) का वैभव मौजूद है।
6
मिरे लिए तो है इक़रार-ए-बिल-लिसाँ भी बहुत
हज़ार शुक्र कि मुल्ला हैं साहिब-ए-तसदीक़
मेरे लिए तो है ज़ुबान से इक़रार भी बहुत, हज़ार शुक्र कि मुल्ला हैं साहिब-ए-तसदीक़।
7
अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी
न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर ओ ज़िंदीक़
अगर इश्क़ है तो मुसलमानी में कुफ़्र भी है, और अगर नहीं है, तो मुसलमाँ मर्द भी काफ़िर और ज़िंदीक़ है।
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