“Then alas, alas, O poet! How can Krishna Kanaiya's flute delight you!When the hunger of the entire world will be appeased,”
तब हाय रे हाय, कवि! तुम्हें कृष्ण कन्हैया की बांसुरी कैसे अच्छी लगती है? जब सारे विश्व की भूख शांत होगी।
यह मर्मस्पर्शी दोहा कवि से पूछता है कि जब दुनिया में भूख व्याप्त है, तब उसे कृष्ण की बाँसुरी कैसे भाती है। यह एक सशक्त स्मरण है कि जहाँ कला और सौंदर्य को सराहा जाता है, वहीं वे तब बेमानी लग सकते हैं जब विश्व इतनी मौलिक पीड़ा से जूझ रहा हो। कवि का तात्पर्य है कि सच्ची शांति और ऐसे अलौकिक संगीत का आनंद तभी लेना चाहिए जब सभी की भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँ। यह करुणा और कर्म का आह्वान है, जो सुझाता है कि शायद हमें कलात्मक सुखों में डूबने से पहले व्यापक कठिनाइयों को कम करने पर ध्यान देना चाहिए।
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