ऊँचे कुल में जामिया , करनी ऊँच न होय। सौरन कलश सुरा , भरी , साधु निन्दा सोय॥ 110॥
“In a noble lineage, the action is not elevated. The pot of wine is filled, but the saint sleeps in criticism.”
— कबीर
अर्थ
ऊँचे कुल के व्यक्ति की करनी (कर्म) उच्च नहीं होती। जिस प्रकार सुरा का कलश भरकर भी साधु निंदा में सो जाता है।
विस्तार
कबीर दास जी इस दोहे में समझा रहे हैं कि सिर्फ ऊँचे कुल में जन्म लेने से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं बन जाता, बल्कि उसके कर्म ही उसकी सच्ची पहचान होते हैं। वे सोने के कलश का उदाहरण देते हैं जिसमें शराब भरी हो – देखने में तो वह कितना ही सुंदर क्यों न हो, साधुजन उसकी निंदा ही करेंगे क्योंकि भीतर तो बुराई ही है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी दिखावे से ज़्यादा हमारे भीतर की शुद्धता और हमारे नेक काम मायने रखते हैं।
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