ग़ज़ल
कबीर 101-110
کبیر 101-110
कबीर की यह रचना आध्यात्मिक मुक्ति के सार को दर्शाती है, जिसमें कहा गया है कि सच्चा ज्ञान कर्म के बंधनों से मुक्त करता है। यह सज्जन व्यक्तियों के लचीलेपन की तुलना दुर्जनों के भंगुर स्वभाव से करती है, और एक गुरु की अतुलनीय व अवर्णनीय महत्ता पर गहराई से जोर देती है।
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1
तब लग तारा जगमगे , जब लग उगे न सूर। तब लग जीव जग कर्मवश , ज्यों लग ज्ञान न पूर॥ 101॥
तभी तक तारा चमकेगा, जब तक सूर जागेगा। तभी तक जीव कर्म से चलेगा, जब तक ज्ञान पूरा नहीं होगा।
2
आस पराई राख्त , खाया घर का खेत। औरन को प्त बोधता , मुख में पड़ रेत॥ 102॥
पराए आस (आशा) ने घर का खेत खा लिया; औरन को बंधन (समझ) आता है, पर मुख में रेत पड़ जाती है।
3
सोना , सज्जन , साधु जन , टूट जुड़ै सौ बार। दुर्जन कुम्भ कुम्हार के , ऐके धका दरार॥ 103॥
हे सोने, सज्जन और साधु जन, तुम सौ बार टूटकर जुड़ सकते हो। लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार की तरह तुम्हें एक ही बार में दरार दे सकते हैं।
4
सब धरती कारज करूँ , लेखनी सब बनराय। सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय॥ 104॥
मैं हर धरती को युद्ध का मैदान बना दूँगा और हर लेखनी को हथियार। मैं सात समुद्र की स्याही से गुरु के गुणों को लिखूँगा, फिर भी वे लिखे नहीं जा सकते।
5
बलिहारी वा दूध की , जामे निकसे घीव। घी साखी कबीर की , चार वेद का जीव॥ 105॥
मैं उस दूध को न्योछावर करता हूँ जिसमें घी निकलता है। कबीर के घी जैसे जीवन, चारों वेदों के जीवन के समान है।
6
आग जो लागी समुद्र में , धुआँ न प्रकट होय। सो जाने जो जरमुआ , जाकी लाई होय॥ 106॥
वह आग जो समुद्र में लगी, उससे धुआँ नहीं निकलता। वैसे ही वह जीवन भी गुजर जाता है, जिसका कोई प्रभाव या चमक नहीं होती।
7
साधु गाँठि न बाँधई , उदर समाता लेय। आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय॥ 107॥
साधु गाँठ बांधने के बजाय, पेट जितनी जगह ले लेता है। जब हरि आगे-पीछे खड़े होंगे, तब वह (ज्ञान/फल) देगा।
8
घट का परदा खोलकर , सन्मुख दे दीदार। बाल सने ही सांइया , आवा अन्त का यार॥ 108॥
घट का परदा खोलकर, उन्होंने सामने दीदार दिया। हे सांवले प्यारे, आपके बाल सजे हुए हैं और आपकी आवाज़ मधुर आनंद है।
9
कबिरा खालिक जागिया , और ना जागे कोय। जाके विषय विष भरा , दास बन्दगी होय॥ 109॥
कबीरा कहते हैं कि, कौन जागा और कौन नहीं जागा? जिसका विषय विष से भरा है, वह दास भी बन्दगी हो जाता है।
10
ऊँचे कुल में जामिया , करनी ऊँच न होय। सौरन कलश सुरा , भरी , साधु निन्दा सोय॥ 110॥
ऊँचे कुल के व्यक्ति की करनी (कर्म) उच्च नहीं होती। जिस प्रकार सुरा का कलश भरकर भी साधु निंदा में सो जाता है।
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