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अपने-अपने साख की , सबही लीनी मान। हरि की बातें दुरन्तरा , पूरी ना कहूँ जान॥ 124॥

The worth of each one, I accept as true; the words of Hari, I cannot fully tell you.

कबीर
अर्थ

अपनी-अपनी साख को सब ही मैंने मान लिया है। भगवान हरि की बातें मैं पूरी तरह से आपको नहीं बता सकता।

विस्तार

कबीरदास जी यहाँ गहरी विनम्रता और स्वीकार्यता दिखाते हैं। वे कहते हैं कि हर व्यक्ति की अपनी बात, अपनी सच्चाई और मर्यादा होती है, जिसे वे सहर्ष मानते हैं। पर साथ ही, वे यह भी बताते हैं कि हरि यानी ईश्वर की बातें इतनी विशाल और गहरी हैं, इतनी दूर तक फैली हुई हैं कि उन्हें पूरी तरह शब्दों में बयान करना या जानना किसी के बस की बात नहीं। यह दर्शाता है कि दिव्य ज्ञान हमारी समझ और भाषा से परे है।

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