ग़ज़ल
कबीर 121-130
کبیر 121-130
कबीर की ये साखियाँ परम सत्य की अगाध और अवर्णनीय प्रकृति का अन्वेषण करती हैं, जो द्वैत से परे है। वे इच्छाओं से विरक्ति और वर्तमान स्थिति की स्वीकृति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग सुझाती हैं। कबीर जोर देते हैं कि सच्ची भक्ति बाहरी दिखावों या अनुष्ठानों के बजाय ईमानदारी और सच्चाई में निहित है, और वे परमात्मा के विषयों की विशालता को स्वीकार करते हैं जिन्हें पूरी तरह से समझना मानव क्षमता से परे है।
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1
एक कहूँ तो है नहीं , दूजा कहूँ तो गार। है जैसा तैसा हो रहे , रहें कबीर विचार॥ 121॥
यदि मैं एक बात कहूँ तो वह नहीं है, और यदि मैं दूसरी बात कहूँ तो वह झूठ है। जैसा है, वैसा ही शायर को विचार करना चाहिए।
2
जो तु चाहे मुक्त को , छोड़े दे सब आस। मुक्त ही जैसा हो रहे , बस कुछ तेरे पास॥ 122॥
यदि तुम मुक्त होना चाहती हो, तो सभी आसक्तियों को छोड़ दो। जैसे तुम मुक्त होती जा रही हो, वैसे ही बस तुम मेरे पास रहोगी।
3
साँई आगे साँच है , साँई साँच सुहाय। चाहे बोले केस रख , चाहे घौंट भुण्डाय॥ 123॥
साँई (ईश्वर) से पहले सत्य है, और ईश्वर ही सत्य है। चाहे वह सुंदरता की बात करे या त्याग की, यह सच है।
4
अपने-अपने साख की , सबही लीनी मान। हरि की बातें दुरन्तरा , पूरी ना कहूँ जान॥ 124॥
अपनी-अपनी साख को सब ही मैंने मान लिया है। भगवान हरि की बातें मैं पूरी तरह से आपको नहीं बता सकता।
5
खेत ना छोड़े सूरमा , जूझे दो दल मोह। आशा जीवन मरण की , मन में राखें नोह॥ 125॥
शायर कह रहे हैं कि योद्धा को अपना कार्यक्षेत्र नहीं छोड़ना चाहिए; उसे मोह के दो पक्षों से लड़ना चाहिए और जीवन-मृत्यु की आशा को मन में बनाए रखना चाहिए।
6
लीक पुरानी को तजें , कायर कुटिल कपूत। लीख पुरानी पर रहें , शातिर सिंह सपूत॥ 126॥
पुराने धोखे को त्याग दो, कायर और कुटिल पुत्र। पुराने लेख पर बने रहो, शातिर और बहादुर पुत्र।
7
सन्त पुरुष की आरसी , सन्तों की ही देह। लखा जो चहे अलख को , उन्हीं में लख लेह॥ 127॥
सन्त पुरुष का शरीर एक दर्पण के समान है। जो व्यक्ति अलख (परम ज्ञान) की इच्छा रखता है, उसे वह उन्हीं में मिल जाता है।
8
भूखा-भूखा क्या करे , क्या सुनावे लोग। भांडा घड़ निज मुख दिया , सोई पूर्ण जोग॥ 128॥
भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग। भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग॥ इस दोहे का शाब्दिक अर्थ है कि मैं भूखा रहकर क्या करूं और लोगों को क्या सुनाऊं। अपना मुख यज्ञ की अग्नि में समर्पित कर देना ही पूर्ण योग है।
9
गर्भ योगेश्वर गुरु बिना , लागा हर का सेव। कहे कबीर बैकुण्ठ से , फेर दिया शुक्देव॥ 129॥
गर्भ में स्थित योगेश्वर गुरु के बिना, हर कोई सेवा में लग गया। कबीर कहते हैं कि उन्होंने वैकुण्ठ को शुक्देव का निवास बना दिया।
10
प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बनाय। चाहे घर में वास कर , चाहे बन को जाय॥ 130॥
प्रेम की भावना एक होनी चाहिए, भले ही उसके वेश अनेक हों। वह चाहे घर में रहे या जंगल में घूमता रहे।
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