“What shall I do, what shall I sing to the people? I offered my own face to the sacrificial fire; thus is complete yoga.”
भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग। भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग॥ इस दोहे का शाब्दिक अर्थ है कि मैं भूखा रहकर क्या करूं और लोगों को क्या सुनाऊं। अपना मुख यज्ञ की अग्नि में समर्पित कर देना ही पूर्ण योग है।
कबीर दास जी कहते हैं कि जब व्यक्ति ने अपना मुख (जो उसकी पहचान और अहंकार का प्रतीक है) ही त्याग की अग्नि में समर्पित कर दिया, तो उसके पास दुनिया को सुनाने या दिखाने के लिए कुछ बचता ही नहीं। यह अपने 'मैं' को पूरी तरह मिटा देने की गहरी छवि है। वे समझाते हैं कि सच्चा योग या पूर्ण मिलन बाहर की दुनियावी पहचान और प्रदर्शन में नहीं, बल्कि इस आंतरिक त्याग और स्वयं को मिटा देने में है। इसी में सच्ची शांति और संतोष मिलता है।
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