घी के तो दर्शन भले , खाना भला न तेल। दाना तो दुश्मन भला , मूरख का क्या मेल॥ 185॥
“Better to glimpse ghee, but not to eat the oil. Grain is a friend to the enemy; what association is there for a fool?”
— कबीर
अर्थ
घी को देखना अच्छा है, पर तेल खाना नहीं। दाना तो दुश्मन के लिए अच्छा होता है; मूर्ख का क्या संबंध है।
विस्तार
यह दोहा हमें बहुत प्यारी सीख देता है। कबीरदास जी कहते हैं कि शुद्ध घी को बस देखना ही अच्छा है, उसे तेल की तरह बेहिचक खाना ठीक नहीं; यानी जीवन में अच्छी और सच्ची चीज़ों को समझदारी से परखें, न कि उनमें पूरी तरह डूब जाएँ। दूसरी बात ये कि अनाज तो इतना उपयोगी है कि वो दुश्मन के भी काम आता है, पर एक मूर्ख व्यक्ति की संगति से कोई लाभ नहीं होता। यह हमें बुद्धिमानी और विवेक से जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
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