ग़ज़ल
कबीर 181-190
کبیر 181-190
कबीर के ये दोहे संसार की अशुद्धियों के बीच साधु की अटल पवित्रता, मूर्खता पर ज्ञान के महत्व और संघर्ष से बचने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। कबीर जीवन की क्षणभंगुरता पर भी चिंतन करते हैं, इसे चक्की के दो पाटों के बीच फंसे दाने जैसा बताते हैं, जो क्षय और मृत्यु की अनिवार्यता को दर्शाता है।
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1
चन्दन जैसा साधु है , सर्पहि सम संसार। वाके अग्ङ लपटा रहे , मन मे नाहिं विकार॥ 184॥
चंदन के समान साधु है, पर संसार सर्प के समान है। यह अपने वाक से लिपटा रहे, पर मन में कोई विकार नहीं होता।
2
घी के तो दर्शन भले , खाना भला न तेल। दाना तो दुश्मन भला , मूरख का क्या मेल॥ 185॥
घी को देखना अच्छा है, पर तेल खाना नहीं। दाना तो दुश्मन के लिए अच्छा होता है; मूर्ख का क्या संबंध है।
3
गारी ही सो ऊपजे , कलह कष्ट और भींच। हारि चले सो साधु हैं , लागि चले तो नीच॥ 186॥
जो व्यक्ति विनम्रता और कष्ट त्यागकर चला जाता है, संघर्ष और परेशानी भी समाप्त हो जाती है। जो साधु जैसा व्यवहार करता है, वह वास्तव में virtuous होता है; और जो लालच से चलता है, वह नीच होता है।
4
चलती चक्की देख के , दिया कबीरा रोय। दुइ पट भीतर आइके , साबित बचा न कोय॥ 187॥
चलती चक्की देखकर कबीर रोए। दो पाट के भीतर आके, साबित बचा न कोई।
5
जा पल दरसन साधु का , ता पल की बलिहारी। राम नाम रसना बसे , लीजै जनम सुधारि॥ 188॥
एक साधु का एक क्षण का दर्शन अत्यंत मूल्यवान होता है, और यह कामना है कि राम नाम के अमृत से हृदय में निवास करे, जिससे जीवन में सुधार हो।
6
जब लग भक्ति से काम है , तब लग निष्फल सेव। कह कबीर वह क्यों मिले , नि:कामा निज देव॥ 189॥
जब तक भक्ति का कार्य है, तब तक सेवा व्यर्थ नहीं है। शायर कबीर कहते हैं कि निज देव (स्वयं के भीतर के देवता) को क्यों खोजा जाए, क्योंकि वह भीतर ही है।
7
जो तोकूं काँटा बुवै , ताहि बोय तू फूल। तोकू फूल के फूल है , बाँकू है तिरशूल॥ 190॥
जो बीज जैसा बोओगे, वैसा ही फल पाओगे। मुख से फूल जैसा व्यवहार करोगे, लेकिन तुम्हारे पास त्रिशूल जैसी शक्ति है।
8
जा घट प्रेम न संचरे , सो घट जान समान। जैसे खाल लुहार की , साँस लेतु बिन प्रान॥ 191॥
जिस हृदय में प्रेम का प्रवाह नहीं होता, वह हृदय किसी अन्य हृदय के समान ही है। वह लोहार की खाल के समान है, जिसमें साँस न होने पर प्राण नहीं होते।
9
ज्यों नैनन में पूतली , त्यों मालिक घर माहिं। मूर्ख लोग न जानिए , बहर ढ़ूंढ़त जांहि॥ 192॥
ज्यों नैनों में पुतली (आँसू) होती है, वैसे ही मालिक (ईश्वर) घर में होते हैं। मूर्ख लोग यह नहीं जानते कि वे सागर (बाहरी) में खोज करते रहते हैं।
10
जाके मुख माथा नहीं , नाहीं रूप कुरूप। पुछुप बास तें पामरा , ऐसा तत्व अनूप॥ 193॥
जिसका मुख न माथा हो, न रूप कुरूप। जिसकी सुगंध से पामरा आकर्षित हो, ऐसा तत्व अनूप।
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