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जाके मुख माथा नहीं , नाहीं रूप कुरूप। पुछुप बास तें पामरा , ऐसा तत्व अनूप॥ 193॥

Whose face has no brow, nor beauty, nor ugliness; from whose scent the barbet is drawn, such an incomparable element.

कबीर
अर्थ

जिसका मुख न माथा हो, न रूप कुरूप। जिसकी सुगंध से पामरा आकर्षित हो, ऐसा तत्व अनूप।

विस्तार

कबीरदास जी यहां उस निराकार सत्ता की बात कर रहे हैं जिसका कोई चेहरा या स्वरूप नहीं, जो सुंदरता और कुरूपता के बंधनों से बिल्कुल परे है। वह हमें समझाते हैं कि जिस तरह एक साधारण पक्षी भी उस अदृश्य सुगंध (बास) से खिंचा चला आता है, उसी तरह हमारी आत्मा उस अद्वितीय दिव्य उपस्थिति की ओर सहज ही आकर्षित होती है। यह अलौकिक 'तत्व' इतना अनमोल और बेजोड़ है कि इसे किसी भौतिक मापदंड से समझा नहीं जा सकता, केवल भीतर से महसूस किया जा सकता है।

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पाठ
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