ग़ज़ल
कबीर 211-220
کبیر 211-220
कबीर के इन दोहों में मानव जीवन की क्षणभंगुरता को पानी के बुलबुले के समान दर्शाया गया है। वे मूर्ति पूजा जैसे बाहरी आडंबरों का खंडन करते हुए आंतरिक प्रेमभाव और वास्तविक उपयोगिता को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, चाहे व्यक्ति गृहस्थ हो या त्यागी।
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1
पानी केरा बुदबुदा , अस मानस की जात। देखत ही छिप जाएगा , ज्यों सारा परभात॥ 211॥
पानी केरा बुदबुदा, ऐसी ही है मनुष्य की प्रकृति। यह एक पल में गायब हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पूरी सुबह का प्रकाश।
2
पाहन पूजे हरि मिलें , तो मैं पूजौं पहार। याते ये चक्की भली , पीस खाय संसार॥ 212॥
पाहन पूजने से हरि मिलें, तो मैं पहाड़ पूजूँगा। यह चक्की सचमुच अच्छी है, क्योंकि यह संसार को भरण-पोषण करती है।
3
पत्ता बोला वृक्ष से , सुनो वृक्ष बनराय। अब के बिछुड़े ना मिले , दूर पड़ेंगे जाय॥ 213॥
पत्ते ने पेड़ से कहा, 'सुनो पेड़, अब हम बिछुड़ेंगे तो दोबारा कभी मिल नहीं पाएंगे, और बहुत दूर चले जाएंगे।'
4
प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बजाय। चाहे घर में बास कर , चाहे बन मे जाय॥ 214॥
प्रेम का भाव एक होना चाहिए, और इसके लिए अनेक वेश धारण करना चाहिए। चाहे वह घर में रहना पसंद करे, या जंगल में भटकना।
5
बन्धे को बँनधा मिले , छूटे कौन उपाय। कर संगति निरबन्ध की , पल में लेय छुड़ाय॥ 215॥
जो बंधी हुई है, उसे बांधना और जो मुक्त है, उसे छोड़ना असंभव है। किस उपाय से इस संबंध को तोड़ा जा सकता है और पल को छोड़ा जा सकता है।
6
बूँद पड़ी जो समुद्र में , ताहि जाने सब कोय। समुद्र समाना बूँद में , बूझै बिरला कोय॥ 216॥
जब एक बूँद समुद्र में गिरती है, तो वह क्या जानती है, यह कोई नहीं जानता। और बूँद में जो समुद्र समाया है, उसे समझना बहुत कम लोग जानते हैं।
7
बाहर क्या दिखराइये , अन्तर जपिए राम। कहा काज संसार से , तुझे धनी से काम॥ 217॥
बाहर की चीज़ों पर ध्यान देने के बजाय, मन के भीतर राम का जाप करें। आपका कार्य सांसारिक मोह-माया से नहीं, बल्कि आंतरिक साधना से जुड़ा है।
8
बानी से पहचानिए , साम चोर की घात। अन्दर की करनी से सब , निकले मुँह की बात॥ 218॥
वाणी से पहचानिए, साम चोर की घात। अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के बोलने के तरीके से ही उसके छल या कपट का पता लगाया जा सकता है, और अंततः उसके आंतरिक कर्मों से ही उसके मन की बातें बाहर आ जाती हैं।
9
बड़ा हुआ सो क्या हुआ , जैसे पेड़ खजूर। पँछी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर॥ 219॥
बड़ा होने का क्या फायदा, जैसे खजूर का पेड़। न तो वह पंछी को छाया देता है, और न ही उसका फल पास होता है।
10
मूँड़ मुड़ाये हरि मिले , सब कोई लेय मुड़ाय। बार-बार के मुड़ते , भेड़ न बैकुण्ठ जाय॥ 220॥
हर कोई अलग-अलग तरीकों से हरि (भगवान) को पाने की कोशिश करता है, लेकिन बार-बार ऐसे मुड़ते रहने से भेड़ बैकुंठ नहीं जा पाएगी।
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