“To grow great, what is the use, like the Khajur tree; It gives no shade to the bird, and its fruit is too far to see.”
बड़ा होने का क्या फायदा, जैसे खजूर का पेड़। न तो वह पंछी को छाया देता है, और न ही उसका फल पास होता है।
कबीर दास जी इस प्यारे दोहे में हमें समझा रहे हैं कि सिर्फ बड़ा होना या नाम कमा लेना ही काफी नहीं है, अगर हम किसी के काम न आ सकें। जरा सोचिए, खजूर का पेड़ कितना ऊँचा होता है, पर क्या फायदा जब वो किसी थके पंछी को छाया भी न दे पाए और उसके फल भी इतनी दूर हों कि कोई तोड़ ही न सके! इस उपमा से कबीर जी हमें बताते हैं कि हमारी असली पहचान दूसरों के लिए उपयोगी होने में है, न कि सिर्फ अपनी शान या दिखावे में। हमें ऐसा बनना चाहिए जो दूसरों को सहारा दे, उनके लिए सुलभ हो, न कि बस अपनी ही ऊँचाई में खोया रहे।
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