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हरिया जाने रुखड़ा , जो पानी का गेह। सूखा काठ न जान ही , केतुउ बूड़ा मेह॥ 238॥

The path where the green one goes, that which is the abode of water. The dry wood does not know, the cloud-like rain that falls.

कबीर
अर्थ

जहाँ हरी-भरी चीज़ जाती है, वह पानी का निवास है। सूखा काठ (लकड़ी) यह नहीं जानता कि बादल जैसा बारिश का पानी गिरता है।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ कितनी ख़ूबसूरती से समझा रहे हैं कि जो मन आध्यात्मिक रूप से जीवंत और खुला होता है, वही ज्ञान और ईश्वर की कृपा को पहचान पाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक हरा-भरा पेड़ पानी की कीमत जानता है। लेकिन एक सूखा हुआ मन, जो अज्ञानता में डूबा है, उस पर चाहे जितनी भी सच्चाई की वर्षा हो जाए, वह उसे ग्रहण नहीं कर पाता। यह एक मीठा संदेश है कि हमें अपने भीतर की उस हरी-भरी कोमलता को बचाए रखना चाहिए ताकि हम जीवन के अमृत को सोख सकें।

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