Sukhan AI
ग़ज़ल

कबीर 231-240

کبیر 231-240
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये दोहे संतों के सान्निध्य में मिलने वाले असीम सुख का वर्णन करते हैं, जो स्वर्ग के आनंद से भी बढ़कर है। वे ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाते हैं, जैसे मेहंदी के पत्तों में लाली छिपी होती है। इन पंक्तियों में एक ऐसे शाश्वत लोक की लालसा भी व्यक्त की गई है जहाँ दिन-रात का चक्र नहीं होता, जहाँ केवल चिरस्थायी शांति है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
राम बुलावा भेजिया , दिया कबीरा रोय। जो सुख साधु सगं में , सो बैकुंठ न होय॥ 231॥
राम ने बुलावा भेजा, और कबीर रोए। साधु संग में जो सुख है, वह बैकुंठ में नहीं है।
2
संगति सों सुख्या ऊपजे , कुसंगति सो दुख होय। कह कबीर तहँ जाइये , साधु संग जहँ होय॥ 232॥
अच्छी संगति से सुख उत्पन्न होता है, और बुरी संगति से दुख होता है। कबीर कहते हैं कि तुम्हें हमेशा साधु (सज्जन) की संगति में रहना चाहिए।
3
साहिब तेरी साहिबी , सब घट रही समाय। ज्यों मेहँदी के पात में , लाली रखी न जाय॥ 233॥
हे साहिब, आपकी साख (साथ) हर हृदय में फैल रही है। जैसे मेहंदी के पत्ते में लाल रंग को सीमित नहीं किया जा सकता।
4
साँझ पड़े दिन बीतबै , चकवी दीन्ही रोय। चल चकवा वा देश को , जहाँ रैन नहिं होय॥ 234॥
जैसे ही शाम ढलती है और दिन बीत जाता है, चकवी रोती है और हम भी रोते हैं। हे चकवा, तुम उस देश चले जाओ जहाँ रात नहीं होती।
5
संह ही मे सत बाँटे , रोटी में ते टूक। कहे कबीर ता दास को , कबहुँ न आवे चूक॥ 235॥
अर्थात्, प्रभु ही सत्य का बँटवारा करते हैं, और भोजन भी साझा किया जाता है। शायर कबीर कहते हैं कि हे भक्त, तुम्हें कभी गलती नहीं होगी।
6
साईं आगे साँच है , साईं साँच सुहाय। चाहे बोले केस रख , चाहे घौंट मुण्डाय॥ 236॥
साईं के आगे सत्य ही सत्य है, और साईं ही सत्य हैं, हे प्रिय। चाहे वह बालों के पर्दे की बात करे या कटे हुए सिर की।
7
लकड़ी कहै लुहार की , तू मति जारे मोहिं। एक दिन ऐसा होयगा , मैं जारौंगी तोहि॥ 237॥
लकड़ी कह रही है कि लुहार से, 'तुम अपने मन से मुझे धोखा देते हो। एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुम्हें जला दूँगी।'
8
हरिया जाने रुखड़ा , जो पानी का गेह। सूखा काठ न जान ही , केतुउ बूड़ा मेह॥ 238॥
जहाँ हरी-भरी चीज़ जाती है, वह पानी का निवास है। सूखा काठ (लकड़ी) यह नहीं जानता कि बादल जैसा बारिश का पानी गिरता है।
9
ज्ञान रतन का जतनकर माटी का संसार। आय कबीर फिर गया , फीका है संसार॥ 239॥
ज्ञान के रत्न को संजोने वाला यह संसार है। शायर कबीर फिर चले गए, और यह संसार फीका पड़ गया।
10
ॠद्धि सिद्धि माँगो नहीं , माँगो तुम पै येह। निसि दिन दरशन शाधु को , प्रभु कबीर कहुँ देह॥ 240॥
धन-वैभव और सिद्धियाँ माँगना नहीं चाहिए; इसके बजाय, ये माँगना चाहिए कि प्रभु कबीर हर रात किसी संत का दर्शन दें।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.