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पूत पियारौ पिता कौं , गौहनि लागो घाइ। लोभ-मिठाई हाथ दे , आपण गयो भुलाइ॥ 263॥

My beloved son, you are a thorn to your father; for the sweetness of greed, you have forgotten your own home.

कबीर
अर्थ

पियू (पुत्र) पिता के लिए प्रिय है, लेकिन वह एक कांटे जैसा है। लोभ और मिठास के हाथ ने उसे अपना घर भुला दिया है।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में माता-पिता की उस गहरी निराशा को समझाते हैं जब उनकी प्यारी संतान ही उन्हें काँटे-सी चुभने लगती है। वे कहते हैं कि जब हम लालच की मीठी-मीठी बातों में उलझकर उसे अपने हाथों में ले लेते हैं, तब अपनी जड़ों को, अपने घर को ही भूल जाते हैं। यह एक चेतावनी है कि बाहरी मोह हमें अपने सच्चे रास्ते और अपनी पहचान से भटका सकता है।

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