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ग़ज़ल

कबीर 261-270

کَبِیر 261-270
कबीर· Ghazal· 10 shers

ये पद लोभ के विनाशकारी प्रभाव और ईश्वर प्राप्ति के लिए काम, क्रोध व तृष्णा को त्यागने की आवश्यकता पर बल देते हैं। कबीर आत्मा की अपवित्रता और परमात्मा की शुद्धता का भाव व्यक्त करते हुए बताते हैं कि अंतिम आध्यात्मिक अनुभव अवर्णनीय है। वे भक्तों को प्रसन्नतापूर्वक हरि के गुणों का गान करने और धैर्य रखने का उपदेश देते हैं, क्योंकि वास्तविक ज्ञान यात्रा के अंत में ही प्रकट होता है।

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1
पूत पियारौ पिता कौं , गौहनि लागो घाइ। लोभ-मिठाई हाथ दे , आपण गयो भुलाइ॥ 263॥
पियू (पुत्र) पिता के लिए प्रिय है, लेकिन वह एक कांटे जैसा है। लोभ और मिठास के हाथ ने उसे अपना घर भुला दिया है।
2
हाँसी खैलो हरि मिलै , कौण सहै षरसान। काम क्रोध त्रिष्णं तजै , तोहि मिलै भगवान॥ 264॥ जा कारणि में ढ़ूँढ़ती , सनमुख मिलिया आइ। धन मैली पिव ऊजला , लागि न सकौं पाइ॥ 265॥
हरि से हँसकर खेलना चाहिए, क्योंकि कौन इतना गहरा दुख सह सकता है। काम, क्रोध और तृष्णा का त्याग कर, तुम्हें भगवान मिलेंगे। जो संसार में खोजती है, उसे सनमुखि मिल जाते हैं। वह धन जो मैला और उज्ज्वल है, उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता।
3
पहुँचेंगे तब कहैगें , उमड़ैंगे उस ठांई। आजहूं बेरा समंद मैं , बोलि बिगू पैं काई॥ 266॥
पहुँचने पर हम कहेंगे कि हम उस जगह पर बहुत खुश होंगे। आज मैं नदी में यह कह रहा हूँ कि बिगु को क्या हुआ है।
4
दीठा है तो कस कहूं , कह्मा न को पतियाइ। हरि जैसा है तैसा रहो , तू हरिष-हरिष गुण गाइ॥ 267॥
अगर तुमने देख लिया है, तो मैं क्या कहूँ? इसे संदेह का विषय मत बनाओ। हरि (विष्णु) जैसा रहो, और हरि के गुणों का गुणगान करते रहो।
5
भारी कहौं तो बहुडरौं , हलका कहूं तौ झूठ। मैं का जाणी राम कूं नैनूं कबहूं न दीठ॥ 268॥
यदि मैं भारी बात कहूँ तो मुझे डरेंगे, और यदि मैं हल्की बात कहूँ तो मुझे झूठा मानेंगे। मैं कैसे जानूँ कि राम की आँखें कभी मेरी तरफ नहीं देखेंगी।
6
कबीर एक न जाण्यां , तो बहु जाण्यां क्या होइ। एक तै सब होत है , सब तैं एक न होइ॥ 269॥
कबीर कहते हैं कि यदि आप कबीर को नहीं जानते हैं, तो बहुत कुछ जानना क्या लाभ है। सार रूप में, सब कुछ कबीर है, और कबीर से कुछ भी अलग नहीं है।
7
कबीर रेख स्यंदूर की , काजल दिया न जाइ। नैनूं रमैया रमि रह्मा , दूजा कहाँ समाइ॥ 270॥
कबीर कहते हैं कि माथे पर चंदन की रेखा और आँखों में काजल नहीं टिकता; क्योंकि इन नैनों में तो स्वयं रमैया का रूप बसता है, जो कहीं और समा नहीं सकता।
8
कबीर कूता राम का , मुतिया मेरा नाउं। गले राम की जेवड़ी , जित खैंचे तित जाउं॥ 271॥
कबीर कहते हैं कि मैं राम का त्याग कर चुकी हूँ और मेरा नाम मुतिया है। मैं राम की पायल से बंधी हूँ, और जहाँ भी वह मुझे खींचती है, मैं वहीं चली जाती हूँ।
9
कबीर कलिजुग आइ करि , कीये बहुत जो भीत। जिन दिल बांध्या एक सूं , ते सुख सोवै निचींत॥ 272॥
कबीर! कलियुग में आकर तुमने बहुत कुछ किया। जिस दिल से एक संबंध बांधा, तुम्हें उसी से सुख मिला।
10
जब लग भगहित सकामता , सब लग निर्फल सेव। कहै कबीर वै क्यूँ मिलै निह्कामी निज देव॥ 273॥
जब तक भगवत् प्राप्ति का सुख मिल जाता है, तब तक सारा सेवा का कार्य व्यर्थ लगता है। शायर कबीर कहते हैं कि बिना इच्छा के अपने ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है।
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