Sukhan AI
कबीर रेख स्यंदूर की , काजल दिया न जाइ। नैनूं रमैया रमि रह्मा , दूजा कहाँ समाइ॥ 270॥

O Kabir, the vermillion line, the kohl cannot reside; in these eyes, the charm of Krishna dwells, where else can it abide?

कबीर
अर्थ

कबीर कहते हैं कि माथे पर चंदन की रेखा और आँखों में काजल नहीं टिकता; क्योंकि इन नैनों में तो स्वयं रमैया का रूप बसता है, जो कहीं और समा नहीं सकता।

विस्तार

अरे वाह, कबीर का यह दोहा कितना सुंदर भाव समझाता है! वे कहते हैं कि जब हमारे मन और आँखों में उस प्यारे 'रमैया' यानी भगवान का वास हो जाता है, तो फिर किसी और चीज़ की गुंजाइश ही कहाँ बचती है। जैसे एक विवाहित स्त्री अपनी माँग में सिंदूर सजाती है, तो फिर काजल की क्या ज़रूरत, क्योंकि असली सौंदर्य तो भीतर है। यह दरअसल बताता है कि जब हम ईश्वर प्रेम में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो दुनिया की दिखावटी चीजें अपने आप ही मायने खो देती हैं।

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पाठ
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