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परनारी राता फिरैं , चोरी बिढ़िता खाहिं। दिवस चारि सरसा रहै , अति समूला जाहिं॥ 288॥

The woman wanders at night, stealing morsels to eat. In the day, the sarasa remains, completely withered and dry.

कबीर
अर्थ

परनारी रात में घूमती है और चोरी करके खाने के लिए निवाला ले जाती है। दिन में, सारस (बगुला) का रहना बहुत ही मुरझाया और सूखा रहता है।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ बड़ी गहरी बात कह रहे हैं। वो हमें समझा रहे हैं कि कैसे हमारा मन पराई चीज़ों या क्षणिक सुखों में भटकता रहता है, जैसे कोई चोरी करके चंद पल की ख़ुशी ढूँढे। ये सुख बस कुछ ही दिनों के लिए ताज़ा रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई चीज़ कुछ दिन हरी-भरी दिखे और फिर जड़ समेत सूख जाए। इस दोहे के ज़रिए कबीर जी यही बता रहे हैं कि दुनियावी मोह-माया और झूठे दिखावे का आनंद अल्पकालिक होता है, और सच्चा सुकून तो भीतर की सच्चाई में ही मिलता है।

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