ग़ज़ल
कबीर 271-280
کبیر 271-280
कबीर के ये दोहे आंतरिक पवित्रता के महत्व पर जोर देते हैं और वासना व इंद्रिय सुखों के खतरों की निंदा करते हैं। कबीर चेतावनी देते हैं कि क्षणभंगुर सुखों के पीछे भागना जीवन को व्यर्थ कर देता है और आध्यात्मिक पतन की ओर ले जाता है। वे पराई स्त्री से संबंध को लहसुन के समान बताते हैं, जिसकी दुर्गंध छिप नहीं सकती।
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1
पतिबरता मैली भली , गले कांच को पोत। सब सखियन में यों दिपै , ज्यों रवि ससि को जोत॥ 274॥
पति का साथ मैले वस्त्र से अच्छा है और गले में काँच के आभूषण से बेहतर है। मैं सभी सखियों में ऐसी हूँ, जैसे चंद्रमा को सूर्य का प्रकाश।
2
कामी अभी न भावई , विष ही कौं ले सोधि। कुबुध्दि न जीव की , भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि॥ 275॥
हे कामी, अभी इच्छा मत करो और यह विष मत ग्रहण करो। किसी प्राणी का जीवन क्या है कि वह ऐसे परमानंद में रहे?
3
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~* भगति बिगाड़ी कामियां , इन्द्री केरै स्वादि। हीरा खोया हाथ थैं , जनम गँवाया बादि॥ 276॥
भक्ति को बिगाड़ने वाली कामुकता, इंद्रियों को स्वादिष्ट लगती है। इससे व्यक्ति हाथ से हीरा खो देता है और अपना जीवन बर्बाद कर देता है।
4
परनारी का राचणौ , जिसकी लहसण की खानि। खूणैं बेसिर खाइय , परगट होइ दिवानि॥ 277॥
यह दोहा कहता है कि एक स्त्री की सुंदरता सुगंधित कृपा के खान जैसी होती है; जिसकी साँसें मधुर हैं और जो दैवीय प्रकाश से चमकती है।
5
परनारी राता फिरैं , चोरी बिढ़िता खाहिं। दिवस चारि सरसा रहै , अति समूला जाहिं॥ 288॥
परनारी रात में घूमती है और चोरी करके खाने के लिए निवाला ले जाती है। दिन में, सारस (बगुला) का रहना बहुत ही मुरझाया और सूखा रहता है।
6
ग्यानी मूल गँवाइया , आपण भये करना। ताथैं संसारी भला , मन मैं रहै डरना॥ 289॥
हे ज्ञानी मूल, तुमने अपना ज्ञान खो दिया; तुम इस संसार से बंध गए हो। फिर भी, मन में संसार के नश्वर होने का भय बना हुआ है।
7
कामी लज्जा ना करै , न माहें अहिलाद। नींद न माँगै साँथरा , भूख न माँगे स्वाद॥ 290॥
कामी को लज्जा नहीं होती, और न ही वह स्त्री से डरता है। नींद में भी वह साथ नहीं मांगता, और न ही भूख में स्वाद की इच्छा करता है।
8
कलि का स्वामी लोभिया , पीतलि घरी खटाइ। राज-दुबारा यौं फिरै , ज्यँ हरिहाई गाइ॥ 291॥
कलि का स्वामी लोभिया है, जो पीतल के बर्तन में खट्टा है। वह जिस तरह हरिहाई गाते हुए घूमता है, उसी प्रकार राज-दुबारा में भी घूमता है।
9
स्वामी हूवा सीतका , पैलाकार पचास। राम-नाम काठें रह्मा , करै सिषां की आंस॥ 292॥
हे स्वामी, जो सीता का निवास हैं, और पचासवाँ पहलू हैं। राम का नाम ही बहुत शक्तिशाली है, जो चमत्कार करता है।
10
इहि उदर के कारणे , जग पाच्यो निस जाम। स्वामी-पणौ जो सिरि चढ़यो , सिर यो न एको काम॥ 293॥
इस पेट (जीवन) के कारण से, संसार भटका हुआ है। हे स्वामी, जो सिर आपके ऊपर रखा गया था, वह किसी एक काम के लिए नहीं है।
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