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कलि का स्वामी लोभिया , पीतलि घरी खटाइ। राज-दुबारा यौं फिरै , ज्यँ हरिहाई गाइ॥ 291॥

The master of Kali is Lobhiya, who is sour in the brass pot. Like Harihai singing, he wanders in the kingdom-twice.

कबीर
अर्थ

कलि का स्वामी लोभिया है, जो पीतल के बर्तन में खट्टा है। वह जिस तरह हरिहाई गाते हुए घूमता है, उसी प्रकार राज-दुबारा में भी घूमता है।

विस्तार

कबीर जी यहाँ हमें समझा रहे हैं कि आज के युग का असली शासक कौन है। वे कहते हैं कि इस कलयुग का स्वामी और कोई नहीं, बल्कि 'लोभिया' यानी लालच है, जो पीतल के बर्तन में रखी किसी खट्टी चीज़ जैसा तुच्छ और बेस्वाद है। फिर वे बड़े मार्मिक ढंग से कहते हैं कि इसी लालच के कारण हम सब दुनियावी चक्करों में बार-बार उसी तरह भटकते रहते हैं, जैसे कोई 'हरिहाई' (भटकी हुई) गाय या कोई घिसी-पिटी धुन बार-बार सुनाई देती है।

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