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कबीर हरि सब कूँ भजै , हरि कूँ भजै न कोइ। जब लग आस सरीर की , तब लग दास न होइ॥ 403॥

Kabir, everyone worships Hari (the Divine), but no one truly worships Hari. As long as the attachment to the body remains, one is not truly a servant (of the Divine).

कबीर
अर्थ

कबीर कहते हैं कि हर कोई भगवान की पूजा करता है, लेकिन कोई भी वास्तव में भगवान की पूजा नहीं करता। जब तक शरीर के प्रति आसक्ति बनी रहती है, तब तक मनुष्य सच्चे सेवक नहीं बन सकता।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ एक बहुत गहरी बात समझा रहे हैं, कि ऊपर से तो सब प्रभु को पूजते हैं पर सच्चे मन से कम ही लोग ऐसा करते हैं। वो कहते हैं कि जब तक हमारे मन में अपने शरीर और उसकी इच्छाओं का मोह बना रहता है, तब तक हम ईश्वर के सच्चे भक्त या दास नहीं बन पाते। जब तक यह 'शरीर की आस' है, तब तक हमारी भक्ति अधूरी है। सच्चा दास तो वही है जो शरीर के बंधन से मुक्त होकर हरि में लीन हो जाए।

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पाठ
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