ग़ज़ल
कबीर 401-410
کبیر 401-410
कबीर के ये दोहे ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति और पूर्ण समर्पण पर जोर देते हैं। वे साधकों को प्रेम और ज्ञान के माध्यम से मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का आग्रह करते हैं, साथ ही सांसारिक मोह त्यागकर और साहस दिखाते हुए हरि के सच्चे सेवक बनने के लिए अंतिम बलिदान देने को भी कहते हैं।
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1
अब तौ जूझया ही बरगै , मुडि चल्यां घर दूर। सिर साहिबा कौ सौंपता , सोंच न कीजै सूर॥ 401॥
अब तो युद्ध हो चुका है और मैं घर दूर जा रहा हूँ। मैं अपना सिर साहिब को सौंपता हूँ; ऐसा मत सोचना, हे शूरवीर।
2
कबीर घोड़ा प्रेम का , चेतनि चाढ़ि असवार। ग्यान खड़ग गहि काल सिरि , भली मचाई मार॥ 402॥
कबीर कहते हैं कि प्रेम के घोड़े पर सवार होकर, चेतना को ऊँचा उठाते हुए, ज्ञान की तलवार लेकर काल के सिर पर प्रहार करके, एक बड़ी गर्जना मचाते हैं।
3
कबीर हरि सब कूँ भजै , हरि कूँ भजै न कोइ। जब लग आस सरीर की , तब लग दास न होइ॥ 403॥
कबीर कहते हैं कि हर कोई भगवान की पूजा करता है, लेकिन कोई भी वास्तव में भगवान की पूजा नहीं करता। जब तक शरीर के प्रति आसक्ति बनी रहती है, तब तक मनुष्य सच्चे सेवक नहीं बन सकता।
4
सिर साटें हरि सेवेये , छांड़ि जीव की बाणि। जे सिर दीया हरि मिलै , तब लगि हाणि न जाणि॥ 404॥ जेते तारे रैणि के , तेतै बैरी मुझ। धड़ सूली सिर कंगुरै , तऊ न बिसारौ तुझ॥ 405॥
सिर साटें हरि सेवेये, छांड़ि जीव की बाणि। जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाणि न जाणि॥ और जेते तारे रैणि के, तेतै बैरी मुझ। धड़ सूली सिर कंगुरै, तऊ न बिसारौ तुझ॥
5
आपा भेटियाँ हरि मिलै , हरि मेट् या सब जाइ। अकथ कहाणी प्रेम की , कह्या न कोउ पत्याइ॥ 406॥
आप सभी से मिलेंगे, हरि से मिलोगे; हरि द्वारा सब मिट जाएगा। प्रेम की कहानी अनकही है; किसी ने कभी इसका वर्णन नहीं किया।
6
जीवन थैं मरिबो भलौ , जो मरि जानैं कोइ। मरनैं पहली जे मरै , जो कलि अजरावर होइ॥ 407॥
जीवन में मर जाना अच्छा है, अगर कोई मरना जानता हो। मृत्यु से पहले मर जाना, अगर कोई काली का संहारक हो।
7
कबीर मन मृतक भया , दुर्बल भया सरीर। तब पैंडे लागा हरि फिरै , कहत कबीर कबीर॥ 408॥
मन मेरा मृत शरीर के समान हो गया है और शरीर दुर्बल हो गया है। तब हरि (भगवान) आए और हँसते हुए बोले, 'कबीर, कबीर।'
8
रोड़ा है रहो बाट का , तजि पाषंड अभिमान। ऐसा जे जन है रहै , ताहि मिलै भगवान॥ 409॥
जीवन का मार्ग बाधाओं से भरा होता है, इसलिए अपनी मनमर्जी और अभिमान को त्याग दो। ऐसा विनम्र व्यक्ति ही भगवान को प्राप्त करता है।
9
कबीर चेरा संत का , दासनि का परदास। कबीर ऐसैं होइ रक्षा , ज्यूँ पाऊँ तलि घास॥ 410॥
कबीर कहते हैं कि संत का चेरा और परदेश का दास (सेवक) होना। वे कहते हैं कि रक्षा भी वैसी ही होती है, जैसे पैरों के पास घास मिल जाती है।
10
अबरन कों का बरनिये , भोपै लख्या न जाइ। अपना बाना वाहिया , कहि-कहि थाके भाइ॥ 411॥
अबरन को का वर्णन कैसे किया जाए, जो कहीं लिखा न जा सके। अपना बना हुआ यह अद्भुत है, भाई, कि यह कभी-कभी छिपा रहता है।
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