अबरन कों का बरनिये , भोपै लख्या न जाइ। अपना बाना वाहिया , कहि-कहि थाके भाइ॥ 411॥
“How can one describe the stain, or the pallor? It cannot be written down. My own creation is so wonderful, brother, that it is sometimes kept hidden.”
— कबीर
अर्थ
अबरन को का वर्णन कैसे किया जाए, जो कहीं लिखा न जा सके। अपना बना हुआ यह अद्भुत है, भाई, कि यह कभी-कभी छिपा रहता है।
विस्तार
यह दोहा बताता है कि कुछ चीज़ें इतनी गहन और अदृश्य होती हैं कि उन्हें शब्दों में ढालना असंभव है, जैसे कोई ऐसा अनुभव जिसका कोई रूप या रंग ही न हो। कवि कहता है कि मेरा अपना अनुभव या मेरा अपना मार्ग इतना अद्भुत और अनूठा है कि उसे बयान करते-करते भाई, ज़ुबान थक जाती है। यह अपने भीतर की उस अद्भुत अनुभूति का वर्णन है जो कहने-सुनने से परे है और जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।
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