सतगुरु शरण न आवहीं , फिर फिर होय अकाज। जीव खोय सब जायेंगे काल तिहूँ पुर राज॥ 467॥
“To the refuge of the True Guru, they do not return, for it is ultimately futile. All beings will lose themselves to time, in the three realms of existence.”
— कबीर
अर्थ
सतगुरु की शरण में न जा पाना, फिर यह सब व्यर्थ है। सभी प्राणी समय के साथ तीनों लोकों में अपना जीवन खो देंगे।
विस्तार
कबीर दास जी इस दोहे में जीवन की एक मार्मिक सच्चाई बताते हैं। वे समझाते हैं कि जो जीव सतगुरु की शरण में नहीं आते, उनके सारे प्रयास बार-बार व्यर्थ ही जाते हैं। दुनिया के मोह में फंसे रहने के कारण, वे अपना अनमोल जीवन खो देते हैं क्योंकि काल (समय) का राज तो तीनों लोकों पर चलता है। यह हमें याद दिलाता है कि आध्यात्मिक मार्गदर्शन के बिना, हम समय के इस अटूट प्रवाह में बहते चले जाते हैं।
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