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ग़ज़ल

कबीर 461-470

کبیر 461-470
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये दोहे आध्यात्मिक सत्य और नश्वरता के विषयों पर प्रकाश डालते हैं। वे छल-कपट से बचने की चेतावनी देते हैं और सतही शुद्धता की निरर्थकता को उजागर करते हैं, जैसे साबुन गहरी जमी गंदगी को साफ नहीं कर पाता। कबीर एक सच्चे सद्गुरु के महत्व पर जोर देते हैं जो गहन आध्यात्मिक रहस्यों को प्रकट करते हैं और शिष्यों को काल के चंगुल से बचाते हैं।

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1
राजा की चोरी करे , रहै रंग की ओट। कहैं कबीर क्यों उबरै , काल कठिन की चोट॥ 464॥
राजा की चोरी को रंग की ओट छिपाती है, और शायर कबीर कहते हैं कि इससे कैसे बचा जा सकता है, जो कि काल की कठिन चोट है।
2
साबुन बिचारा क्या करे , गाँठे राखे मोय। जल सो अरसां नहिं , क्यों कर ऊजल होय॥ 465॥
साबुन बेचारा क्या करे, गाँठें रखे मोय। जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय॥ इसका अर्थ है कि बेचारा साबुन क्या कर सकता है, जो अपनी गाँठें/Secrets अपने अंदर रखता है। न तो जल से और न ही समय से यह ठीक हो सकता है, तो यह क्यों पानी जैसा हो जाता है।
3
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~* सत्गुरु तो सतभाव है , जो अस भेद बताय। धन्य शीष धन भाग तिहि जो ऐसी सुधि पाय॥ 466॥
सत्गुरु स्वयं सत्य की अवस्था हैं, जो इस भेद को समझाते हैं। धन्य होता है वह सिर और भाग्य, जिसे ऐसा ज्ञान प्राप्त होता है।
4
सतगुरु शरण न आवहीं , फिर फिर होय अकाज। जीव खोय सब जायेंगे काल तिहूँ पुर राज॥ 467॥
सतगुरु की शरण में न जा पाना, फिर यह सब व्यर्थ है। सभी प्राणी समय के साथ तीनों लोकों में अपना जीवन खो देंगे।
5
सतगुरु सम कोई नहीं सात दीप नौ खण्ड। तीन लोक न पाइये , अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड॥ 468॥
सतगुरु के समान कोई नहीं, चाहे वह सात दीपों और नौ खंडों में हो, या तीन लोकों और इक्कीस ब्रह्माण्डों में।
6
सतगुरु मिला जु जानिये , ज्ञान उजाला होय। भ्रम का भांड तोड़ि करि , रहै निराला होय॥ 469॥
जब सच्चे गुरु का मिलन होता है, तो स्वयं का ज्ञान हो जाता है। ज्ञान के उजाले से भ्रम का घड़ा टूट जाता है, और व्यक्ति अद्वितीय रूप से मुक्त हो जाता है।
7
सतगुरु मिले जु सब मिले , न तो मिला न कोय। माता-पिता सुत बाँधवा ये तो घर घर होय॥ 470॥
सतगुरु से सब कुछ मिल जाता है, लेकिन न तो कुछ मिलता है और न ही कुछ मिलता है। माता-पिता का संतान से बंधना तो हर घर में होता है।
8
जेहि खोजत ब्रह्मा थके , सुर नर मुनि अरु देव। कहै कबीर सुन साधवा , करु सतगुरु की सेव॥ 471॥
जो व्यक्ति ब्रह्मा आदि को खोजता है, वह थक जाता है। कबीर कहते हैं कि हे साधु, सतगुरु की सेवा करो।
9
मनहिं दिया निज सब दिया , मन से संग शरीर। अब देवे को क्या रहा , यों कयि कहहिं कबीर॥ 472॥
जब मैंने अपना सब कुछ मन से दे दिया, और मन से अपना शरीर भी दे दिया, तो अब मैं और क्या दे सकता हूँ? कबीर कहते हैं।
10
सतगुरु को माने नही , अपनी कहै बनाय। कहै कबीर क्या कीजिये , और मता मन जाय॥ 473॥
वह सच्चे गुरु को नहीं मानता, बल्कि खुद को गुरु बताकर प्रचार करता है। वह कहता है कि 'कबीर क्या करेगा?' और मन पूरी तरह से भ्रमित हो जाता है।
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