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मनहिं दिया निज सब दिया , मन से संग शरीर। अब देवे को क्या रहा , यों कयि कहहिं कबीर॥ 472॥

When I have given everything from my heart, and even my body from my heart; what more can I give? This I Kabir says, when I speak.

कबीर
अर्थ

जब मैंने अपना सब कुछ मन से दे दिया, और मन से अपना शरीर भी दे दिया, तो अब मैं और क्या दे सकता हूँ? कबीर कहते हैं।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपना मन, यानी अपनी सारी भावनाएँ और इच्छाएँ, और यहाँ तक कि अपना शरीर भी पूरी निष्ठा से समर्पित कर देता है, तो फिर भला देने के लिए और क्या बचता है? ये दरअसल पूर्ण समर्पण की बात है, जहाँ इंसान खुद को पूरी तरह खाली कर देता है, मानो अपना सब कुछ लुटा दिया हो। इसमें व्यक्ति अपने 'मैं' को भुलाकर, पूरी तरह से एक हो जाने की अवस्था को दर्शाता है।

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