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सतगुरु को माने नही , अपनी कहै बनाय। कहै कबीर क्या कीजिये , और मता मन जाय॥ 473॥

He does not accept the true Guru, but proclaims himself as such. He says, 'What shall Kabir do?' and the mind is utterly lost.

कबीर
अर्थ

वह सच्चे गुरु को नहीं मानता, बल्कि खुद को गुरु बताकर प्रचार करता है। वह कहता है कि 'कबीर क्या करेगा?' और मन पूरी तरह से भ्रमित हो जाता है।

विस्तार

यह दोहा कबीरदास जी उन लोगों के लिए कहते हैं जो सच्चे गुरु की बात नहीं मानते और खुद को ही ज्ञानी मानकर अपना अलग रास्ता बनाते हैं। ऐसे में मन भटक जाता है और सही राह से दूर चला जाता है, जैसे अँधेरे में कोई रास्ता बताने वाला खुद ही रास्ता न जानता हो। कबीरदास जी बस यही सोचते हैं कि ऐसे लोगों को कैसे समझाया जाए, जब वे अपनी ही बातों में उलझकर सच से दूर होते जाते हैं।

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